2004 में स्थापित पुणे, India
स्क्रीन लेखन विभाग
भारतीय फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान, पुणे
2004 में स्थापित, भाफ़िटेसं का स्क्रीन लेखन विभाग देश का पहला ऐसा विभाग था, जिसने समर्पित स्क्रीन लेखन कार्यक्रम प्रस्तुत किया । स्क्रीन लेखन शिक्षा में अग्रणी, यह विभाग गहन और समग्र शिक्षा प्रदान करता है, ताकि अगली पीढ़ी के स्क्रीन लेखक और कथाकार विकसित हो सकें—जो अपनी अनूठी कलात्मक आवाज़ बनाए रखते हुए सिनेमा और मीडिया उद्योग की लगातार बदलती दुनिया के प्रति संवेदनशील रहें।
यह कार्यक्रम विविध माध्यमों—सिनेमा, टेलीविज़न, वेब सीरीज़ और उभरते डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में—मनोरंजक और प्रभावशाली कथाओं के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए संरचित किया गया है। भारत की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में आधारित यह पाठ्यक्रम छात्रों को कथा कथन की परंपराओं में गहराई से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है, साथ ही नवीनतम रूपों और नई अभिव्यक्तियों का अन्वेषण करने में सक्षम बनाता है। स्थापना के समय से ही, विभाग ने कई स्क्रीन लेखकों को प्रशिक्षित किया है, जिन्होंने ऐसी प्रशंसित फ़िल्में और टेलीविज़न सीरीज लिखी हैं, जो व्यापक और विविध दर्शकों से जुड़ती हैं। उनके कार्यों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित फ़िल्म समारोहों और पुरस्कारों में मान्यता मिली है, जिनमें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, बर्लिनाल और एमी अवार्ड्स शामिल हैं।
एक जीवंत रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करता यह विभाग अपने पूर्व छात्रों और उद्योग पेशेवरों के गतिशील नेटवर्क से लाभान्वित होता है, जो सक्रिय रूप से छात्रों का मार्गदर्शन और सहयोग करते रहते हैं। यह निरंतर आदान-प्रदान सीखने, नवाचार और कलात्मक उत्कृष्टता की संस्कृति को बढ़ावा देता है, जिससे हमारे स्क्रीन लेखक भारतीय और वैश्विक सिनेमा की कथा कथन परंपराओं में सार्थक योगदान देने में सक्षम बनते हैं।
- कार्यक्रम का नाम : सिनेमा में ललित कला में स्नातकोत्तर
- विशेषज्ञता : पटकथा लेखन (फिल्म, टीवी और वेब श्रृंखला)
- कार्यक्रम अवधि : दो वर्ष (चार सत्र)
- कुल क्रेडिट : 80
| सिनेमा में ललित कला में स्नातकोत्तर- पटकथा लेखन | कुल क्रेडिट |
|---|---|
| पहला सत्र (सामान्य मॉड्यूल) | 20 |
| दूसरा सत्र (विशेषज्ञता) | 20 |
| तीसरा सत्र (विशेषज्ञता) | 20 |
| चौथा सत्र (विशेषज्ञता) | 20 |
कार्यक्रम का परिचय
स्क्रीन लेखन में विशेषज्ञता के साथ सिनेमा में ललित कला के स्नातकोत्तर एक दो वर्षीय, चार सत्रों का पेशेवर कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य उद्योग के लिए तैयार पटकथा लेखकों को विकसित करना है। संरचित लेखन अभ्यास, फिल्म विश्लेषण और संकाय और उद्योग पेशेवरों से मार्गदर्शन के माध्यम से, छात्र मूल फीचर फ़िल्म की पटकथाएं, पूर्ण वेब सीरीज मार्गदर्शिका, और सहयोगात्मक लेखन परियोजना लिखते हैं, साथ ही वे सिनेमाई कहानी कहने की कला, बौद्धिक संपदा और भारतीय फ़िल्म उद्योग से संबंधित आवश्यक ज्ञान प्राप्त करते हैं। कार्यक्रम का समापन एक अंतिम पिचिंग कार्यशाला और उद्योग-उन्मुख पिचिंग मैराथन के साथ होता है।
- सत्र I : सिद्धांत और व्यवहार के माध्यम से फिल्म निर्माण के मूलभूत सिद्धांतों की एक सुदृढ़ आधारशिला स्थापित की जाती है।
- सत्र II : फीचर फिल्म लेखन, विश्लेषण और संरचित विकास के माध्यम से स्क्रीनराइटिंग कौशल को सुदृढ़ किया जाता है, साथ ही इसके अंतर्विषयी पहलुओं को भी शामिल किया जाता है। इस चरण के बाद सिनेमा में स्नातकोत्तर पदविका (स्क्रीन लेखन में विशेषज्ञता) के साथ निकास का विकल्प उपलब्ध है।
- सत्र III : शैली अध्ययन, श्रृंखला विकास तथा सहयोगात्मक प्रक्रियाओं के माध्यम से पूर्ण-लंबाई (फीचर) पटकथा और कड़ी-आधारित (एपिसोडिक) लेखन को उन्नत स्तर पर ले जाया जाता है।
- सत्र IV : शोध-प्रबंध पटकथा (थीसिस स्क्रीनप्ले) के विकास, प्रस्तुतीकरण (पिचिंग), औद्योगिक कार्यप्रणालियों तथा शोध-प्रबंध फिल्म निर्माण में व्यावहारिक सहभागिता तथा उद्योग से संवाद के माध्यम से पेशेवर तैयारी पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता है।
कार्यक्रम के उद्देश्य
यह कार्यक्रम छात्रों को सिनेमाई कहानी कहने की सुदृढ़ आधारशिला प्रदान करने का उद्देश्य रखता है, जिससे वे मौलिक कथात्मक विचारों की कल्पना, विकास और परिष्कार कर उन्हें पूर्ण-लंबाई की फीचर फ़िल्म या कड़ी-आधारित (एपिसोडिक) पटकथाओं में रूपांतरित कर सकें। नाट्य लेखन के सिद्धांतों—जैसे चरित्र, संघर्ष, संरचना, विषय और दृश्यात्मक अभिव्यक्ति—के गहन अध्ययन के माध्यम से यह कार्यक्रम कथात्मक रचना में विश्लेषणात्मक और सृजनात्मक दोनों प्रकार की दक्षता विकसित करने का प्रयास करता है। छात्रों को विद्यमान सिनेमाई और कड़ी-आधारित (एपिसोडिक) कृतियों की सराहना एवं समालोचनात्मक विश्लेषण करना सिखाया जाएगा, साथ ही उद्योग-मानक पटकथा लेखन और उससे संबंधित विकासात्मक दस्तावेजों—जैसे सार (सिनॉप्सिस), विवरण (ट्रीटमेंट), रूपरेखा (आउटलाइन) तथा प्रस्तुतीकरण सामग्री—तैयार करने के व्यावहारिक कौशल भी प्रदान किए जाएंगे। कार्यक्रम के अंतर्गत पाठ्यक्रम छात्रों को भारतीय सिनेमा के औद्योगिक परिवेश, बौद्धिक संपदा अधिकारों तथा सहयोगात्मक कार्यप्रणालियों से परिचित कराते हुए उनकी व्यावसायिक तैयारी पर भी विशेष बल देता है। व्यक्तिगत रचनात्मक अभिव्यक्ति के प्रति जागरूकता के साथ-साथ सहयोगात्मक और व्यावहारिक सीमाओं की समझ विकसित करते हुए, यह कार्यक्रम छात्रों को समकालीन पेशेवर संदर्भों के अनुरूप बहुमुखी, मौलिक और निर्माण-उन्मुख पटकथाएँ विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।
कार्यक्रम विशिष्ट परिणाम (पीएसओ)
इस कार्यक्रम की पूर्णता पर सभी स्नातकों से अपेक्षित है कि वे:
- सिनेमाई कथन की गहरी समझ विकसित कर मौलिक कथात्मक फीचर फिल्म विचारों को सशक्त दृश्यात्मक कल्पना के साथ पूर्ण विकसित पटकथाओं में रूपांतरित करने में सक्षम हों।
- कथात्मक साहित्य (नैरेटिव फिक्शन) की सुदृढ़ समझ के साथ नाट्य लेखन के विभिन्न पक्षों जैसे चरित्र, परिवेश, संघर्ष, कथा, मूल विचार (प्रिमाइस), विषय, संरचना, कथानक विन्यास, दृश्य-निर्माण, संवाद तथा रूपकात्मक तत्व का सूक्ष्म ज्ञान रखते हों।
- फीचर फिल्म और कड़ी-आधारित (एपिसोडिक) प्रारूपों की सराहना एवं विश्लेषण करने के साथ-साथ पूर्ण विकसित पटकथाएँ तैयार करने की कार्य-प्रणाली से परिचित हों।.
- फीचर फिल्म/ कड़ी-आधारित (एपिसोडिक) परियोजनाओं से संबंधित विभिन्न दस्तावेज जैसे सार (सिनॉप्सिस), विवरण (ट्रीटमेंट), रूपरेखा (आउटलाइन), चरित्र-रेखाचित्र, श्रृंखला संदर्भ-पुस्तिका, प्रस्तुतीकरण प्रस्तुति-पत्र (पिच डेक) आदि लिखने में दक्ष हों।
- उद्योग-मानकों एवं प्रारूपों के अनुरूप पटकथा लेखन में प्रवीण हों तथा विभिन्न चरणों में निर्माताओं, निर्देशकों, अभिनेताओं और अन्य संभावित सहयोगियों के समक्ष अपनी पटकथाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत (पिच) और वर्णित करने में सक्षम हों।
- भारतीय सिनेमा के औद्योगिक परिवेश मुख्यधारा एवं स्वतंत्र दोनों की समग्र समझ रखते हों, जिसमें बौद्धिक संपदा अधिकारों का ज्ञान तथा एक स्वतंत्र (फ्रीलांस) पटकथा लेखक के रूप में अनुबंध, गोपनीयता समझौते (एनडीए), समझौता ज्ञापन (एमओयू) और रिलीज़ दस्तावेजों जैसी पेशेवर प्रक्रियाओं को समझने एवं संभालने का आत्मविश्वास शामिल हो।
- अपनी व्यक्तिगत रचनात्मक अभिव्यक्ति (आर्टिस्टिक वॉइस) और लेखन शैली की गहरी समझ विकसित कर एक समग्र कौशल-समूह अर्जित करें, जो इस विशिष्ट अभिव्यक्ति को बहुमुखी रूप में प्रस्तुत करने में सहायक हो।
- व्यावहारिक सीमाओं को ध्यान में रखते हुए रचनात्मक पटकथा लेखन करने में सक्षम हों तथा निर्देशक, सह-लेखक, अभिनेता, छायाकार और कला निर्देशक जैसी रचनात्मक टीमों के साथ मिलकर पूर्ण विकसित पटकथाएँ तैयार करने की क्षमता प्रदर्शित करें।
संकाय सदस्य
- सुमित कुमार – प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष (प्रभारी)
- धर्मकृति सुमन - सहयोगी प्राध्यापक
- वैभव जाधव : सहयोगी प्राध्यापक
- समीर सरल शर्मा : सहयोगी प्राध्यापक
- जागृति ठाकुर : सहायक प्राध्यापक
- श्रीकृष्ण पांडे : सहायक प्राध्यापक

